कर्नाटक ही नहीं इन राज्यों के मामले भी सुप्रीम कोर्ट की दहलीज तक पहुंचे

0
1046

कर्नाटक में भाजपा बेशक सबसे बड़ी पार्टी के तौर पर उभरी है लेकिन उसके पास राज्य में सरकार बनाने के लिए पर्याप्त बहुमत नहीं है। राज्यपाल ने अपने विवेक से भाजपा को सरकार बनाने का न्यौता दिया है। जिसकी वजह से गुरुवार को बीएस येदियुरप्पा ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली है। मगर उनके लिए यह शपथ लेना आसान नहीं था क्योंकि कांग्रेस और जेडीएस ने इसे रुकवाने के लिए सुप्रीम कोर्ट में संयुक्त याचिका दाखिल की थी। हालांकि कोर्ट ने शपथग्रहण पर रोक लगाने से इंकार कर दिया मगर सरकार से विधायकों की सूची मांगी है। आपको बता दें कि यह पहला मामला नहीं है जो सुप्रीम कोर्ट की चौखट तक पहुंचा हो इससे पहले भी कई ऐसी परिस्थिति सामने आ चुकी हैं। आज हम आपको बताते हैं ऐसे ही कुछ मामले जो कोर्ट पहुंचे।

1. साल 1997 में उस समय कांग्रेस नेता रहे जगदंबिका पाल को एक दिन का मुख्यमंत्री बनने का मौका मिला था। उस समय राज्यपाल रहे रोमेश भंडारी ने 21-22 फरवरी के दौरान राज्य में राष्ट्रपति शासन की अनुशंसा की थी लेकिन केंद्र सरकार ने उनकी इस अनुशंसा को खारिज कर दिया था। इस फैसले से खुश भाजपा के मुख्यमंत्री उम्मीदवार कल्याण सिंह ने 93 सदस्यों वाली कैबिनेट को शपथ दिलाई थी जिसमें दूसरी पार्टियों के विधायक भी शामिल थे। दूसरे राजनीतिक पार्टी इस फैसले से नाखुश थे और उन्होंने सरकार को गिराने की कोशिश की। सिंह को झटका तब लगा जब राज्यपाल ने उनकी पार्टी में दूसरे दलों के विधायक होने की वजह से कैबिनेट को रातोंरात भंग कर दिया। जिसके बाद पाल को मुख्यमंत्री बनने का मौका मिला लेकिन वह भी एक दिन से ज्यादा पद पर नहीं बैठ पाए।

2. 9 मार्च 2005 को सुप्रीम कोर्ट ने झारखंड विधानसभा के प्रोटम स्पीकर को निर्देश दिए कि वह सदन में विश्वासमत पारित करवाए जिससे कि पता चल जाएगा कि मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा या राज्यपाल द्वारा बनाए गए मुख्यमंत्री शिबू सोरेन किसके पास बहुमत है। तीन जजों की बेंच ने याचिकाकर्ता मुंडा को अंतरिम राहत दी क्योंकि उन्होंने मामले में मजबूत दलीलें दी थीं। कोर्ट ने राज्यपाल से कहा था कि वह किसी पार्टी द्वारा विश्वासमत हासिल किए जाने का इंतजार करे ताकि राज्य में एक वैध सरकार बनाई जाए। इस फैसले का नतीजा यह हुआ कि सदन में सोरेन सरकार बहुमत हासिल नहीं कर पाई। जिसके बाद सोरेन को अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा।

3. साल 2016 में उत्तराखंड के उस समय मुख्यमंत्री रहे हरीश रावत की सरकार को तब झटका लगा केंद्र सरकार ने मार्च 2016 को राज्य में राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया था। इस फैसले के खिलाफ प्रदेश सरकार ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। चीफ जस्टिस केएम जोसेफ की अध्यक्षता वाली बेंच ने 21 मई 2016 को राष्ट्रपति शासन के आदेश को रद्द कर दिया और रावत को 29 अप्रैल को सदन में बहुमत साबित करने के लिए कहा। जिसमें कांग्रेस को 33 और बीजेपी को 28 वोट मिले और सरकार ने अपना कार्यकाल पूरा किया।

4. साल 2017 में गोवा में हुए चुनाव में भाजपा को कम सीटें मिलने के बावजूद राज्यपाल मृदुला सिन्हा ने मनोहर पर्रिकर को सरकार बनाने का न्यौता दिया। 40 सीटों वाली विधानसभा में भाजपा को 13 जबकि कांग्रेस को 17 सीटें मिली थीं। राज्यपाल के फैसले को चुनौती देते हुए कांग्रेस नेता चंद्रकांत कावलेकर 13 मार्च 2017 को सुप्रीम कोर्ट पहुंचे। कोर्ट ने कांग्रेस की आपत्ति को खारिज करते हुए सदन में विश्वासत साबित करने का आदेश दिया। जिसके बाद पर्रिकर सरकार सदन में बहुमत साबित करने में सफल रही।

5. तमिलनाडु में जयललिता के निधन के बाद बनी राजनीतिक अस्थिरता का मामला मद्रास हाईकोर्ट पहुंच गया था। जिसपर सुनवाई करते हुए 20 सितबंर 2017 को कहा था कि उसके अगले फैसले तक ना तो सदन में बहुमत साबित क्या जाएगा और ना ही 18 विधानसभा सीटों पर चुनाव कराए जाएंगे। स्पीकर ने 18 सदस्यों को निलंबित कर दिया था। इस गतिरोध के बाद पलानीस्वामी की सरकार ने सदन में विश्वासमत हासिल कर लिया और मुख्यमंत्री बनें।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here