एससी एसटी एक्ट : अमित शाह का मास्टर स्ट्रोक, 15 फीसदी नहीं, 29 फीसदी वोट पर निगाह

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भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह को आधुनिक भारतीय राजनीति का चाणक्य कहा जाए तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। एससी एसटी एक्ट पर अध्यादेश लाने की रणनीति के पीछे अमित शाह का दिमाग लगा था।

इसमें कोई दो राय नहीं कि बीजेपी आज जिस मुकाम पर पहुंच चुकी है, उसमें सबसे बड़ा योगदान सवर्ण और बनिया बिरादरी का रहा है लेकिन अमित शाह स्टाइल पॉलिटिक्स में ऐसी बातों के लिए कोई मायने नहीं रखता। अमित भाई जीत के धुरंधर है और राजनीति में जीत के लिए सब जायज़ है।

अमित शाह अपनी अगली रणनीति के लिए पिछली राजनीति का अध्ययन करते हैं। उन्होंने महसूस किया कि सवर्ण जमात के लिए कितना भी कुछ कर दो, ये आपके स्थायी वोटर नहीं हो सकते। ये आज हैं, कल छिटक भी सकते हैं। कल तक कांग्रेस के साथ थें, आज बीजेपी के साथ हैं, कल कहां होंगे, कोई नहीं जानता।

अमित शाह ने इन तथ्यों पर भी गौर किया कि नेहरू से लेकर इंदिरा गांधी के जमाने में कांग्रेस अपने शासन के 25 राज्यों में से 22 मुख्यमंत्री सवर्ण बनाती थी, फिर भी सवर्ण उनके नहीं हुए तो फिर भाजपा के कैसे हो सकते हैं !

इसके उलट दलित वोटर जब भी किसी के साथ होता है तो उसका अच्छा बुरा वक्त नहीं देखता। वो यूपी में मायावती के साथ अच्छे वक़्त में था तो बुरे वक्त में भी है। बिहार में लोजपा के साथ तब भी था जब वो शून्य पर थी और आज केंद्र- राज्य की सत्ता में हिस्सेदार है, तब भी उनके साथ है। अमित शाह की निगाह इसी खास वजह से दलितों पर है।

अमित शाह कभी भी कच्ची गोलियां नहीं खेलते। देश के कुल मतदाताओं में एससी एसटी की जनसंख्या 30 प्रतिशत है जबकि सवर्ण 15 फीसदी हैं। वहीं ओबीसी की आबादी 41 फीसदी है। अमित शाह का गणित यह है कि कांग्रेस के नेतृत्व में महागठबंधन बनने की सूरत में उन्हें कम से कम 50 फीसदी वोट शेयर की ज़रूरत होगी।

ओबीसी तबके में आने वाले यादव समाज का वोट बीजेपी को नहीं मिलेगा। ये अकेले 10 फीसदी के आसपास हैं। अब ओबीसी गणित हुआ 31 फीसदी जो बीजेपी के पक्ष में एकजुट रहेगा। पीएम मोदी स्वयं ओबीसी कोटे से आते हैं।

इस 31 फीसदी के अतिरिक्त 30 फीसदी एससी एसटी वोट में से 20 फीसदी भी जुड़ता है तो ये 51 प्रतिशत हो जाता है। अगर ये 51 फीसदी वोटों का समीकरण सेट हुआ तो अमित शाह की रणनीति पूरी तरह सफल होगी। महागठबंधन धराशायी होगा और कांग्रेस मुक्त भारत का सपना शायद साकार होता दिखेगा।

उधर सवर्णों को कोई भी मोर्चा बनाने के लिए ओबीसी या मुसलमानों के साथ की ज़रूरत होगी क्योंकि एससी एसटी एक्ट के दुरुपयोग से ये भी चिंतित रहते हैं लेकिन कहानी में ट्विस्ट यह है कि ओबीसी तबका अपने समुदाय के प्रधानमंत्री यानी नरेंद्र मोदी का साथ भाजपा के स्वर्ण काल में क्यों छोड़ेगा और सोशल मीडिया पर सवर्ण टाइटल वाले आईडी से मुसलमानों के मजहब को लेकर इतनी गालियां दी गई है कि वो उनके साथ आने से रहें।

आप गौर करेंगे तो पाएंगे कि फेसबुक या ट्विटर पर मुसलमानों के खिलाफ सर्वाधिक पोस्ट या कमेंट मिश्रा, तिवारी, चौबे, झा, शर्मा, अवस्थी, शुक्ला, दुबे, पाठक, त्रिपाठी, त्रिवेदी जैसे उपनामों से ही होता है।

इधर सवर्ण जितना ही मोदी- शाह का विरोध करेंगे, दलित उतनी ही तेजी से भाजपा के पक्ष में गोलबंद होंगें। भाजपा की अगली रणनीति दलित आरक्षण को 15 की बजाय 25 फीसदी तक ले जाना है। भाजपा के लिए राहत की बात यह है कि आरएसएस इस दलित प्लान से सहमत है।

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