HC ने सरकार को लगायी फटकार – कुछ भी कीजिए लेकिन शिक्षा को बचाइए, वरना कुछ भी नहीं बचेगा

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शिक्षकों से मिड डे मील (मध्याह्न भोजन) तथा अन्य गैर शैक्षणिक काम लेने पर हाईकोर्ट ने नाराजगी जताई है। कोर्ट ने सरकार से तल्ख भाव में कहा-’कुछ भी कीजिए लेकिन शिक्षा को बख्श दीजिए। वरना आने वाली पीढ़ी को देने के लिए कुछ नहीं रहेगा।’ कोर्ट ने सरकार को 30 मार्च तक ऐसी कार्यप्रणाली बनाने की बात कही है, ताकि शिक्षक गैर शैक्षिक कार्यों से पूरी तरह मुक्त रहें। अगली सुनवाई 3 अप्रैल को होगी।

कोर्ट ने कहा-30 मार्च तक ऐसी कार्यप्रणाली बनाएं, ताकि शिक्षक गैर शैक्षिक कार्यों से मुक्त हो सकें

न्यायमूर्ति डॉ. अनिल कुमार उपाध्याय की एकल पीठ ने राज्य प्राथमिक शिक्षक संघ व अन्य की तरफ से दायर रिट याचिकाओं को सुनते हुए मंगलवार को कहा कि शिक्षकों को मिड डे मील या दूसरे गैर शैक्षणिक कार्यों में लगाना मुनासिब नहीं है। उन्होंने शिक्षा विभाग के प्रधान सचिव को 30 मार्च तक ऐसी कार्यप्रणाली विकसित करने का आदेश दिया, जिससे शिक्षक सिर्फ शिक्षण कार्य ही करें।

याचिकाकर्ताओं के वकील ने दी दलील-अव्यावहारिक कदम से हो रहा भ्रष्टाचार

याचिकाकर्ताओं की तरफ से पूर्व महाधिवक्ता पीके शाही ने कोर्ट को बताया कि प्राथमिक स्कूलों में मिड डे मील के लिए प्रति छात्र रोज औसतन 3.37 रुपए मिलते हैं। इससे चावल को छोड़, भोजन के बाकी सामान तथा ईंधन का इंतजाम करना होता है। यह घोर अव्यावहारिक है। इसी वजह से भ्रष्टाचार भी होता है। मिड डे मील मुहैया कराने वाली समिति, बच्चों की उपस्थिति बढ़ा-चढ़ा कर दर्शाती है, ताकि ज्यादा राशि की निकासी हो सके। ऐसे कई काम का खामियाजा स्कूल को, खासकर हेडमास्टर को भुगतना पड़ता है। शिक्षकों का सर्वाधिक समय मिड डे मील के इंतजाम तथा बच्चों को भोजन कराने में ही गुजरता है।

सरकार का तर्क-मिड डे मील में शिक्षकों की भूमिका सीमित
मामले की सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की तरफ से बहस करते हुए अपर महाधिवक्ता आशुतोष रंजन पांडेय एवं सरकारी वकील (संख्या दो) प्रशांत प्रताप ने कोर्ट को बताया कि मिड डे मील में शिक्षकों की भूमिका सिर्फ छात्रों की उपस्थिति व इसके लिए जरूरी राशि का चेक निर्गत करने की होती है। इस पर कोर्ट ने कहा कि शिक्षकों को इन दोनों जिम्मेदारी से भी मुक्त क्यों नहीं रखा जाता है, ताकि उनका पूरा समय व ध्यान केवल शैक्षणिक कार्यों में रहे।

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