एक रिक्शा चालक का बेटा बन गया IAS – गोविंद जायसवाल

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भोजपुरी माटी के लाल ने किया  कमाल

भोजपुरी भाषा बोलने वाले न सिर्फ खुद्दार बल्कि  जुझारू भी  होते हैं।   इस बात को सही साबित कर दिखाया है  बनारस के गोविंद जायसवाल ने | अपने अटल इरादों  से गोविन्द  जायसवाल  ने गरीबी को  हरा दिया और इस तरह ,एक रिक्शाचालक का बेटा IAS बन गया।

पिता को राशन दुकान बंद कर रिक्शा चलाना पड़ा 

गोविंद के पिता नारायण जायसवाल बनारस की एक राशन दुकान में काम करते थे। छह लोगों का परिवार था और काम किसी तरह चल जाता था। एक दिन वह दुकान अचानक बंद हो गयी। नारायण दास सड़क पर आ गये। रोजी- रोटी के लिए जब कोई और रास्ता नहीं मिला तो उन्होंने एक रिक्शा खरीद लिया।

पिता की तबियत हुयी ख़राब 

 उन्होंने दिन-रात मेहनत की। एक रिक्शा से 36 रिक्शा बना लिया। सबको भाड़ा पर लगा दिया। आमदनी बढ़ी तो बनारस में तीन प्लॉट भी खरीद लिये। लेकिन अचानक नारायण जायसवाल की तबियत खराब हो गयी। उनका काम लड़खड़ाने लगा। रिक्शा बिक गये। घर चलाने के लिए खुद रिक्शा चलाने की नौबत आ गयी।

बेटी की शादी के लिए  जमीन के दो प्लॉट बेचने पड़े

तब तक गोविंद कॉलेज की पढ़ाई के लिए BHU पहुंच चुके थे। बेटी की शादी के लिए नारायण जायसवाल को जमीन के दो प्लॉट बेचने पड़े। गोविंद ने बहुत अच्छ् नम्बरों से ग्रेजुएशन की परीक्षा पास की। उनके पिता ने जमीन का बचा हुए एक अंतिम प्लॉट भी बेच दिया। उन्होंने गोविंद को 40 हजार रुपये दिये और कहा कि दिल्ली जा कर अपने सपने को पूरा करे।

लोगो ने उड़ाया उनका मजाक 

गोविंद दिल्ली गये। एक कोचिंग संस्थान में एडमिशन लिया। जो पैसे थे वे खर्च हो गये। दिल्ली में रहने के लिए गोविंद ने बच्चों को ट्यूशन पढ़ाना शुरू किया। वे खुद भी 10-12 घंटे पढ़ाई करते। लोग उनका मजाक उड़ाते कि भला इतनी कमजोर बैकग्राउंड का लड़का IAS करेगा। IAS बनना मजाक है किया ? लेकिन गोविंद ने तो अपने प्राणों की बाजी लगा दी थी।

पहली ही कोशिश में 48वीं रैंक हासिल की

कई बार एक टाइम के खाना पर ही गुजारा कर लेते। कम भोजन और अधिक मेहनत के काऱण वे बीमार पड़ गये। डॉक्टर ने कहा आराम करो तो उन्होंने कहा बहुत देर हो जाएगी। इतिहास और मनोविज्ञान विषय लेकर वे UPSC की परीक्षा में बैठे। हिंदी माध्यम से परीक्षा दी। पहली ही कोशिश में 48वीं रैंक हासिल कर ली।वे हिन्दी माध्यम से परीक्षा देने वालों की सूची में पहले स्थान पर रहे।

छात्रों के लिए बने प्रेरणाश्रोत

जैसे एक करिश्मा हो गया। आभाव और उपेक्षा की जिंदगी जी रहे गोविंद के जीवन में अब खुशियां ही खुशियां छा गयीं। प्रतिष्ठा कदम चूमने लगी। बनारस ही नहीं देश भर में गोविंद जायसवाल एक चर्चित हस्ती बन गये। नारायण जायसवाल अपने बेटे की उपलब्धि पर फूले नहीं समाये। आज गोविंद वैसे छात्रों के लिए प्रेरणाश्रोत बन चुके हैं जो साधारण हो कर भी कुछ खास करना चाहते हैं।

सोच बदल जाती है तो हालात भी बदल जाते हैं

गोविंद जायसवाल की कहानी एक आम इंसान के खास होने की कहानी है। गोविंद ने बताया कि कोई गरीब हो सकता है, शरीर से दुबला पतला हो सकता है लेकिन उसके अंदर भी एक फौलादी ताकत है। ये ताकत सोच और विचार की है। जब सोच बदल जाती है तो हालात भी बदल जाते हैं।

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